प्रिय ऊसर भूमि भयी नगरी,तुमसे रजनी-रज प्रीत निभाए।
गिरि गौ जमुना विनती करते,अब नंदनिवास बयार न आए।
मनमोहन मूर्छित जीवन है,जबसे तुम गोकुल गाम भुलाए। [१]
निज शीश लगाकर धूलि प्रिया,नित नैन निशा निरसा बरसाती।
हिय में हिय आलय मंजुल,कोकिल पादप में नहि नीड़ बनाती।
अवलोकन हेतु अहीरिन द्वीपवती तट शैलसुते छवि ध्याती।
बिधना विधि लेख कहें करुणा,पर नेह वनी हम नीर बहातीं। [२]
चिर प्रेमिल प्रीतम दो बिछड़े,मधि सूर्यसुता विमला चिर धारा।
मथुरा धरती पथ कर्म भरा,हम प्रेम प्रधा धुर पालनहारा।
तन राजनिवास करे पर मानस गोकुल का मनका ध्रुव तारा।
बिरहा तमसा हिय के स्मृति पाटन पे करती निज प्राण प्रहारा। [३]
परिणीत ऋणी हम प्राण प्रिया पद के परिचारक'पौ प्रतिछाया'।
स्मृति साथ लिए हिलकोर अहो,हृद सिंधु विशाल मथा करि माया।
मम उद्धव ज्ञान भरो मन में,दयनीय हुई यह कोमल काया।
अभिमान भरे मन में भरपूर,पुरोहित सूर्य प्रदीप दिखाया। [४]
नर सुंदर रूप मनोहर मोहन,चित्त लगाकर मोह बढ़ाया।
तुम चाह करो सब संकट ओझल,जाल स्वयं तुमने उलझाया।
सुनि माधव प्रेम बड़ा दुखदायक,ज्ञान प्रभा प्रभु जीवन माया।
शुभचिंतक की बड़ बात सजीव,विकार उधौ मन आप अघाया। [५]
असहाय उधौ हम ग्वालिन प्रीत, विलुप्त हुई पर मोहित होती।
नित नैन बसे रसिका कहती,प्रिय प्रीतम पीर स्वयं अब रोती।
दृगनीर अथाह पयोधि समान,रमेश प्रिया विधि पृष्ठ भिगोती।
समझे नहि रीति-विछोह उधौ,वह माधव जागत माधव सोती। [६]
'सत-निर्गुण' उद्धव के प्रभु शास्वत,नश्वर सुंदर मन्मथ काया।
तव भ्रात वृहस्पति शिष्य प्रवीण,उपाय नवीन उधौ मन आया।
भ्रम अंतर का प्रलयंकर माधव,प्रेम मृषा धिषणा भरमाया।
यह पाठ प्रधान परागत चित्त,सनातन सत्यम जान न पाया। [७]
अनुरोध करें जग पालनहार,उधौ तुम गोकुल गाम पधारो।
कहना अनमोल दृगंब विलोचन में भर किंचित सोच विचारो।
सब ग्वालिन सौं कहियो भइया,अब तो रसराज अतीत बिसारो।
अवधान अबोध धरी अनुराग-प्रमाद,अतः अब पार उतारो। [८]
अभिरंजित माधव प्रेम प्रदीप समान प्रवाहित विष्णुपदी में।
सलिला तट स्यंदन संग उधौ मन दर्प लिए गमनीय गदी में।
पद-पाणि प्रधा पद उद्धव,प्रेमिल पूजन पुंज प्रदोष निधी में।
अवनी अवलोकन हेतु अमर्त्य अपंक खड़े नभ पूर्त सदी में। [९]
ब्रजभूमि सुवासित स्नेह सुधा चहुँओर विराजत जीवन तारे।
ब्रज की रज औ' जमुना जल,गोधन गोकुल द्वार उधौ हिय हारे।
धन भाग अवश्य यशोमति के,प्रभु उद्धव के ब्रजराज पधारे।
सबके परमेश्वर निर्गुण,ग्वालिन के हर संशय-संकट सारे। [१०]
सुकुमार सुसज्जित कुंदन भूषण,श्वेत सुकोमल देह सजाए।
रमणी तनया सब तन्मय होकर,सोच रहीं कुछ तो सकुचाए।
रथ भव्य प्रभा त्रिदिवेश समान,अवश्य सखी प्रिय सूचक आए।
हिय उत्सुकतावश स्पंदित औ', अनिमेष निहारत घेर लगाए। [११]
हम माधव बंधु सहोदर उद्धव, श्रीहरि की कथनी दुहराते।
कहते हरि दूत उधौ अरु ग्वालिन को प्रिय स्पर्शित वर्क दिखाते।
कहते हम भ्रात मनोहर के,तुमको परधाम विधा बतलाते।
तब एक अहीरिन पत्र झटी अरु उद्धव विस्मित हो रह जाते। [१२]
गत गीत गए सुर ताल कहाँ,हृदयाँचल से नित थी वह गाती।
नभ खंडित खंडित सृष्टि समस्त,अहो शत खंड हुई वह पाती।
अनुराग रसा रिसता नयनों पर,पक्ष्म प्रतीक्षित नीर दुहाती।
वह बूझ सकी नहि आखर एक,विलाप करे हृद-नैन लगाती। [१३]
वश में अपना कर कोप उधौ,अध आर्द्र निबंध उपांश उठाते।
किस रीति कहें अनभिज्ञ अहीरिन,उद्धव प्रेम कहाँ सुन पाते।
तुम कींह अनर्थ तथा निज हानि,विदारित वर्क नहीं बतलाते।
अब कौन करे अभियोग वृथा,हम ही अब माधव भाष्य सुनाते। [१४]
कुछ उत्सुक तो कुछ व्याकुल ग्वालिन,चित्त करें स्थिर बाँधत ईप्सा।
बहुमूल्य प्रतीति प्रधान पिता,परमेश्वर निर्गुण निष्फल लिप्सा।
तव कुंठित व्याकुल दुर्गम जीवनमार्ग हुआ भर भीतर कुत्सा।
कब मोह हुआ बड़ ज्ञान सदा सत,सद्गति जीवक एकल दिप्सा। [१५]
हम गोप सुता अकुलीन अहीरिन,उद्धव जी तनि स्पष्ट बताओ।
सब जान रहीं सत किंतु पुनः अनुरोध करें कथनी दुहराओ।
कहि स्पष्ट उधौ त्यज मोह दुराह,सभी अब ज्ञान सुधा अपनाओ।
अति व्यस्त मही नहि आ सकते,भव भ्रामक भूत भविष्य भुलाओ। [१६]
भ्रकुटी उचकाकर बोल पड़ी ललिता नर श्रेष्ठ उदार उधौ जी।
कर निष्ठुर हाय गिरा कहते अरु कंपित सागर द्यौ व धरा भी।
जब आप प्रलाप करें कुछ भी तब मौन रहीं सब की सब गोपी।
समझे नहि आप रहे अनभिज्ञ,अहो अनुरक्ति निरंतर होती। [१७]
यदि प्रीति भुलाकर राजनिवास करें मम प्रीतम क्षोभ नहीं है।
नित ही झरते यह नैन निरीह वियोग रहे पर प्रेम यही है।
निज प्राण सहर्ष समर्पित,श्रीचरणों पर वो सब वार रही है।
यह पीर भरा सुख दुर्लभ,क्या नहि माधव ने यह बात कही है। [१८]
यह मात्र मृदा नहि उद्धव जी,कुछ मोहन हैं अरु किंचित राधा।
तन पे रज रंग चढ़े जब जानहि पंडित प्रेम पुराण अगाधा।
तुम श्रेष्ठ परंतु रहे तम में,सखि ने फिरि नूतन सायक साधा।
मृदु गात्र पड़े ब्रजधूलि उधौ,तब ओझल हो भव बंधन बाधा। [१९]
सुकुमार नहीं वह जान पड़े,नख से शिख उद्धव दीखत ग्वाला।
चहुँओर घिरे वह गोपिन ते,उपदेश सुनावत वे ब्रजबाला।
तन धूल भरा मन बूझत उद्धव,केंहि कमंडल सागर डाला।
तम में यदि ज्ञान रखे ललिता,फिर के विधि मानस होय उजाला। [२०]
यमुना तट धारण मौन किए,अनुराग स्वयं अनिमेष निहारे।
सबमें वह किंतु असंग वही,मन के मनके करि अर्पण सारे।
जलमग्न कपोल द्वि नैन भये तर औ' ललिता निज कंठ उबारे।
दृग आतुरता भरके अब उद्धव भी तटिनी तट को पग धारे। [२१]
हिय अंतर में अनुराग अगाध, तिरोहित नेत्रज प्रीत सुनाते।
रवि तारक चंद्र समस्त करें स्तुति,ब्रह्म मही शिव भी गुण गाते।
ऋतु वर्णन जो करती सुख पावत औ' सुनि-सुनि श्रुतिपट तर जाते।
वृषभानु सुता चिर क्षोभ लिए बहती नद संग विभो नहि आते। [२२]
सुध खोय रही दिन-रैन,घड़ी पल चिंतन प्रीतम प्राण थके हैं।
अनुपस्थित चित्त परंतु उधौ अब बाह्य स्वरूप निहार चुके हैं।
मनमीत विचार-विमर्श करें,मन ही मन मोहन मोल बिके हैं।
कहि उद्धव यूँ नटकर्म करो नहि,माधव के सब कर्म रुके हैं। [२३]
सहसा वह बोझिल पक्ष्म उठा,करती अवलोकन श्वास लई ज्यों।
इतने पर उद्धव बोल पड़े,त्यज दो दुख धारण पीर करो क्यों।
नहि प्राप्त हुआ वर मोक्ष,मृषा अभिनय पर अंतर मान करे क्यों।
तब श्याम प्रिया कहि कौन अहो तुम,पाहुँ न प्रीतम तंज कसे यों। [२४]
अभिमान भरे स्वर गर्जन करि,हम उद्धव शिष्य वृहस्पति के हैं।
अरु भ्रात-सखा हम माधव के,नित निर्गुण का हम ध्यान धरे हैं।
कर विस्मृत प्रीति-स्पृहा अब, निर्गुण के गुण गाकर भाग जगे हैं।
ज्वर मान गुमान तथा अभिमान,अतैव उधौ ज्वर-ग्रस्त लगे हैं। [२५]
अभियोग मृषा यह,कल्पित स्वांग कदापि नहीं करती परिणीता।
यह भग्न प्रिया मरुभूमि चिता,जस राम बिना भज नीरस सीता।
ब्रज में रसिका मथुरा रसराज,परंतु विराम प्रमाद सुनीता।
व्यवधान वियोग अतः सुखदायक,माधव मम अपसव्य पुनीता। [२६]
भ्रम मात्र सुनो यह प्रेम तथा मथुरा भव भौन बसे त्रिपुरारी।
अपसव्य अतः तव रिक्त,उधौ कटु वाक्य कहें पर हों हितकारी।
अब दर्शन दो कहि कृष्ण प्रिया,रखते सबकी तुम लाज मुरारी।
हँसते फिर उद्धव अज्ञ अजा पर, व्याकुल चिंतित वे सखि सारी। [२७]
हरि तत्क्षण ही प्रकटे अपसव्य,तथैव उधौ धुर धी चकराई।
दृग विस्मित शोणित की गति तीव्र,प्रिया हरि के हृद आप समाई।
पदपाणि करें वह स्पर्श पुनः,हरि निर्गुण औ'हरि ही रघुराई।
घन प्रीत भरे अरु भौंहनु रीझत,मोहन के मन प्रेयसि भाई। [२८]
कहि माधव भक्त प्रधान उधौ तुम,दर्प परंतु सदैव दुधारा।
पुनि अंतरधान भये पिय निष्ठुर,पाहन सी फिर दीखत धारा।
पिय की छवि देखन को उठती,पर फेर सके कब काल दुबारा।
तट भी तरसें स्थिर कब रहती,तुम भी अति निष्ठुर हो जलधारा।। [२९]
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अंतर में अनुराग प्रलय।
तर उद्धव के अध प्राण हुए।
श्री राधे भजते अज्ञ - विज्ञ।
अति तीक्ष्ण विरह के बाण हुए।
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-- ©ऋतिका 'ऋतु'