अमलतास तुम प्रभात के!
मुखमंडल की मृदु मुस्कान,
कारण हो अश्रुपात के।
गिरिधर स्वयं ही गोवर्धन,
स्रोत पीयूष प्रपात के।
गंधसार सी 'सुधा' सुगंधित,
मस्तक कोमल गात के।
हे मोहन!मैं मधु सुवास सी
अमलतास तुम प्रभात के!
मैं सुंदर सिंदूरी प्राची,
तुम प्रतीत होते अर्क से।
मैं प्रेम पत्र के मौन सी,
तुम परे तर्क वितर्क से।
चाप मैं शिवधनुष की,
तुम शौर्य हो विक्रांत के।
हे मोहन!मैं मधु सुवास सी
अमलतास तुम प्रभात के!
कोटिश रतिपति सा सौंदर्य,
तुम सती के श्रृंगार से।
मैं प्रियतम में थोड़ी सी,
मोहन मुझमें अपार से।
प्रिय अनकहा सा काव्य मैं,
तुम तुक हो मेरे तुकांत के।
हे मोहन!मैं मधु सुवास सी
अमलतास तुम प्रभात के!
© ऋतिका'ऋतु'